Tuesday, April 14, 2015

रंगून - ए फारबिडेन सिटी


स्वाभाव से मधु लोलुप और रस आखेटक होना, "चरन वे मधु विन्दति" अर्थात चलने वाला ही मधु पाता है वाले नारे को स्वीकार करने के लिए  आवश्यक है. मै अपने को उसी प्रजाति का पाता हूँ. पांवो में आभासी चक्र, और किस्मत में धूल फांकने की युगल जोड़ी मुझे आरण्यक तबियत का बना गई. घूमने  में मौज आता है मुझे. हमेशा कमर कसकर घूमने को तैयार बैठे और इंकलाब बोलकर निकल पड़ने को बेताब. मुझे गुरुदेव टैगोर की  पंक्तियाँ याद है अभी भी "आमि जन्मे रोमांटिकआमि सेई पथे  पथिक, जे पथे  देखाय चले दक्खिन वातासे, पाखिर इशारा जाय जे पाथेर अलक्ष्य आकाशे "  अर्थात मै जन्म से रोमांटिक और उस पथ का पथिक हूँ जिधर हवा का इशारा होता है और जिस अलक्ष्य आकाश की तरफ पक्षी इशारा करते है.


उपरोक्त गुरु गंभीर कथन को चाहे तो आप लोग हलके में ले सकते है, क्योकि वो मौज देने वाला नहीं है ऐसा मेरा मानना है और उम्मीद है आप लोगो को भी यही लगा होगा . मने इत्ती  भूमिका के बाद मुझे ये कहना है की गुरु अपन भटकते तो बहुत है लेकिन अनुभवों को लिपिबद्ध  करने में एक लम्बर आलसी और कुछ शब्दों के कम पड़ जाने का डर. कल बातचीत के दौरान शिखा वार्ष्णेय ने रंगून के बारे में मुझसे लिखने का आग्रह किया तो सोचा चलो लिखने की कोशिश करता हूँ, क्या पता रुकी स्याही बह निकले और कलम मुझे पाकर धन्य महसूस करे. 

मार्च के महीने मैंने तय पाया की अप्रैल के प्रथम सप्ताह में मुझे व्यापारिक कारणों से मलय देश ( मलेशिया) और म्यांमार ( बर्मा) की यात्रा करनी है. कुआलालम्पुर और यंगून ( रंगून) मेरे यात्रा के निश्चित पड़ाव थे. रंगून के बारे में केवल इत्ता जानते थे की वहां जाने वाले हर पति को अपनी पत्नी से मोरे पिया गए रंगून, सुनने के लिए टेलीफोन करना पड़ता है, और अंतिम मुग़ल को फिरंगियों ने निर्वासित कर दिया था. हास्य से इतर, रंगून के बारे में कोई सुदृढ़ जानकारी नहीं होने और कई मित्रो द्वारा वहां के खान  पान के बारे में टिप्पणी सुनकर मेरी शाकाहारी जिह्वा शुष्क होने लगती थी. कीट पतंगे खाने के शौक़ीन मुल्क में, मुझ कंद मूल भक्षी की लाज बचाने के लिए श्रीमती जी ने युद्ध स्तर पर तैयारी की और सच्चे हिंदुस्तानी पथिक की तरह मेरी लिए बहुत सारा पाथेय बांध दिया . 

नियत समय पर नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी हवाई अड्डे से मलेशिया एयरलाइन्स की जहाज ने उड़ान भरी कुआलालम्पुर के लिए, विगत दिनों इस एयरलाइन की उड़ानों के साथ  हुए  हादसों की बात एक बार दिमाग में कौंधी लेकिन व्योमबालाओं की प्रभावी स्वागत  मुस्कान के साथ उड़नछू. इस मुस्कान पर तो कवि लोग सर्वस्व निछावर की बात करते है और अपन भी तो कभी कभी कविता पर हाथ साफ़ कर लेते है. अगले पांच घंटे खाते, पीते, संगीत और सनीमा का आनंद लेते बीते और मलय देश सकुशल पहुचने की सूचना की ख़ुशी मैंने मोबाइल के फ्रंट कमरे में अपने चेहरे पर देखी. कुआलालम्पुर हवाई पत्तन की भव्यता को निहार ही रहे थे की हमारे एक सहयोगी जो मुझे होटल पहुँचाने के लिए आये थे उनकी आवाज़ ने तन्द्रा भंग की और मै उनके साथ निकल लिया.


अगले दो दिन व्यापारिक गतिविधियों में आकंठ दुबे रहे और मलेशिया की पहले की यात्राओं में वहां की ज्यादातर दर्शनीय स्थलों को देख चुकने का एहसास भी हावी रहा. रंगून जाने का दिन आ गया और मै फिर कुआलालम्पुर हवाई अड्डे पर था. कुल जमां २ घंटे की उड़ान के बाद जब रंगून अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा तो मुझे पारपत्र ( वीसा ) आदेश के लिए जो की आन अराइवल था, की पंक्ति में खड़ा होकर बनवाने में १ घण्टे लगे. म्यांमार से भारत की सीमाएं लगती है और शताब्दियों से दोनों देश के सम्बन्ध भी रहे है लेकिन विगत ५-६ दशाब्दियों से चीनी प्रभाव के कारण ये सम्बन्ध सुषुप्त अवस्था में रहे है. जैसा की अनुमान था, साधारण सा एयरपोर्ट देश की आर्थिक अवस्था की चुगली कर रहा था. हवाई पत्तन भवन से निकलते ही हमारे व्यापारिक सहयोगी श्रीमान लुइस महोदय अपने वाहन के साथ उपस्थित थे मुझे मेरे ठहरने के स्थान तक पहुँचाने के लिए जो करीब २० किलोमीटर की दुरी पर था. उन्होंने रस्ते में ही मुझे बता दिया की मेरे होटल से पांच सौ मीटर की दुरी पर एक भारतीय रेस्त्रां है जिसका नाम "कोरियंडर लीफ" है.  भारतीय द्वारा संचालित, अपने स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन के लिए स्थानीय भारतीयों के आकर्षण का केंद्र है. आप समझ सकते है मेरे चहरे पर सूरज उग आया.   


 होटल पहुंचकर नहा धोकर सोचा कि पत्नी को यंगून सकुशल पहुचने कि सूचना दे दूँ और वो चिर परिचित सदाबहार गाना भी सुन लूँ लेकिन हाय ये न हो सका. मलेशिया में अच्छा खासा काम कर रहा मेरा फ़ोन यहाँ आकर मरणासन्न अवस्था में था. अंतर्राष्ट्रीय रोमिंग की  सुविधा पर यहाँ प्रतिबन्ध था. इस बात से जेहन में आया कि क्यों म्यानमार एक क्लोज्ड देश है, और विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल और प्रचुर मात्रा में खनिज पदार्थो की उपलब्धता के बाद भी अत्यंत पिछड़ा देश माना जाता है. यहाँ पर छदम लोकतंत्र है जो पूर्व सैनिक अफसरों द्वारा संचालित है और ज्यादातर नागरिक अधिकारों को शूली पर चढ़ा दिया गया है. सरकार के खिलाफ किसी भी विचार को पुरे मनोयोग से कुचलने को प्रतिबद्द है सैनिक सरकार खैर इस उधेड़बुन में मुझे याद आया कि वॉट्सएप्प के माध्यम से बात कि जा सकती है लेकिन वो सुविधा भी आई फ़ोन पर नहीं आई अभी. निर्णय किया कि होटल के फ़ोन से बात कर लूँगा, बाद में एक लोकल सिम कि व्यवस्था हो जाएगी. 

 मुझे लगता है मै गंभीर बातों कि तरफ झुक गया, क्या करूँ तकनीक का विद्यार्थी होने के बावजूद भी मुझे इतिहास और  पुरा संस्कृति में घनघोर रूचि है, तो ये सामयिक विचलन आप लोग स्वीकार कर लेंगे. बर्मा के पुरुषों का एथिकल पहनावा लुंगी और शर्ट है. वो लुंगी को शर्ट के ऊपर बांधते है जैसे हम शर्ट के ऊपर पैंट, बस बेल्ट नहीं प्रयोग करते और स्त्रियां घाघरा चोली में. दक्खिन भारतीय पहनावे जैसा. यहाँ तक कि सरकारी और निजी कंपनियों के कर्मचारी अधिकारी वर्ग भी इसी वेशभूषा में मिलता है. लड़कियों के छोटे होते वस्त्र भले ही पश्चिम कि खोज हो लेकिन अन्य दक्षिणपूर्वी देशो कि तरह यहाँ भी उनको सबल चुनौती मिलती है. मुझे लगता है कि उत्तेजक, नाभिदर्शना इत्यादि शब्द यहाँ इरेलीवेंट है. यहाँ के भोजन के बारे में मै ईमानदारी से बोलना चाहूंगा कि एक दो रेस्त्रां के मेनू देखने और पूछ ताछ करने बाद मैंने निर्णय ले लिया कि इसके बारे लिखने का कार्य मेरे बाद यहाँ आने वाले करेंगे. हर मेनू में पशु पक्षी और कीट पतंगों के विभिन्न डिशेस का नाम शायद मुझे आकृष्ट नहीं कर पाया. सोचता हूँ एक शाकाहारी जीव जाने कितने अनुभवों से वंचित रह जाता होगा 

प्राचीन रंगून का नाम बदल कर यंगून कर दिया गया है जो यहाँ की प्रमुख नदी का नाम है. नदी पर बने एक पुल  को देखकर मुझे अपने हावड़ा पुल  का भ्रम हुआ, पूछने पर पता चला की इसे भी अंग्रेजो ने बनवाया था. शाम के पांच बजने वाले थे, मेरे साथ मेरी स्थानीय सहयोगी मिस नेय थीजो आंग्ल भाषा में पारंगत होने के कारण मेरी सक्षम दुभाषिया भी बन गई थी.

उन्होंने रंगून के प्रमुख दर्शनीय स्थल और विश्व प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर श्वेडेगन पैगोडा देखने के लिए कहा. शहर के बीचोबीच सिंगतुरा पहाड़ियों पर बने  इस सुनहले बौद्ध मंदिर की ऊंचाई करीब १०० मीटर है जिसमे  ६००० किलोग्राम स्वर्ण का प्रयोग हुआ है और इसका शीर्ष कंगूरा पुरे शहर से दिखाई देता है. 

ये मंदिर म्यानमार में बौद्ध धर्म के सर्वोच्च आस्था का केंद्र है. मंदिर प्रांगड़ में विदेशियों के लिए प्रवेश शुल्क १० अमरीकन डॉलर है मिस नेय ने तीसरी शताब्दी में बने इस मंदिर के स्थापत्य और ऐतिहासिकता पर भरपूर प्रकाश डाला और बदले में मैंने बुद्ध धर्म के हिंदुस्तान में उदय और प्रभा हीन होने पर ज्ञान बघारा. 

मंदिर प्रांगण में एक यूरोपियन जोड़े को बुद्ध के बारे में बताते हुए एक गाइड को टोक कर कुछ देर के लिए मैंने उससे कमान ले ली और अपने बोध गया और सारनाथ के पडोसी होने का  सगर्व उल्लेख  किया. जिस पर मिस नेय ने मुझे मंदिर में ही भिक्षुक बन जाने की सलाह दी. बुद्ध की भव्य मूर्तियों को देखकर मुझे उनकी मूर्ती पूजा विरोधी होने की बात अपने अंदर ही रखनी पड़ी, कह देने पर शायद उनकी धार्मिक भावनाओ को आघात पहुंचा सकती थी.
 



अपने अधकचरे ज्ञान पर इठलाता मै मंदिर में बिताये 3 घंटो की आध्यात्मिक थाती के साथ होटल लौट आया.





अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मै पैदल भ्रमण के लिए निकल पड़ा. साफ सुथरी चौड़ी सड़के,  प्रदुषण रहित शहर, सुसज्जित चौराहे और खूबसूरत पार्क. लगता है हरियाली यहाँ अभी लोगो को खटकती नहीं है. मुझे नहीं पता लेकिन दुनिया के बहुत सारे शहर देख चुकने के बाद मुझे ये ऐसा पहला शहर दिखा जिसमे कानूनी रूप से दोपहिया या तिपहिया वाहन प्रतिबंधित है. यातायात सिगनल्स पर कई बार मिलो लम्बी गाड़ियों की कतार पर एकदम सुव्यवस्थित, किसी को पहले निकल जाने की जल्दी नहीं, ना ही हार्न बजाते रईसजादे. ईंधन हमारे देश से आधी कीमत में. गरीब देश होते हुए भी सड़को पर गड्ढे नहीं दिखे ,शायद भ्रष्टाचार के इंडेक्स में म्यांमार अभी नीचे होगा. अंग्रेजो के बनायें हुए भवनो के साथ आधुनिकतम ऊँची ऊँची इमारतें, यातायात नियम के पालन को सतर्क नागरिक. शॉपिंग माल्स के फ़ूड कोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय व्यंजनों की खुशबू और स्ट्रीट फ़ूड के शौकीनों से भरी गलियां लेकिन शाकाहारियों को मुँह चिढ़ाती. थोड़ी देर बाद काम पर जाते लोग दिखने लगे  जिनमे ७० प्रतिशत महिलाएं जो शायद इंगित कर रहे थे समाज में महिला वर्चस्व की तरफ. भाषा की समस्या से मुझे दो चार होना पड़ा जब मैंने एक फल की दुकान से संतरा खरीदना चाहा फिर इशारे से बात हुई. अंग्रेजी जानने वाले यहां कम है. शायद विद्यालयों  में अभी भी अंग्रेजी नहीं पढाई जाती है. बाहर का तापमान बढ़ने पर ज्यादा घूमने का लोभ छोड़कर मै वापस होटल आ गया और नहा धोकर रात भर के उपवास को तोड़ने डाइनिंग हॉल की तरफ चल दिया. 

म्यांमार अपने नव वर्ष के स्वागत को तैयार हो रहा था, जिसे  "वाटर फेस्टिवल" के नाम से जानते है. अगले २-३ दिन बाद सारे सरकारी, और गैर सरकारी संस्थान १० दिनों के लिए बंद रहेंगे. इस त्यौहार का प्रारूप अपने होली से मिलता जुलता है. सड़को के किनारे लकड़ियों से बनी मचानों पर खड़े होकर राह चलते को पानी से भिगोने का चलन है. चुकि म्यांमार बौद्ध धर्मावलम्बी बहुल समाज है और अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु भी , इसलिए यहाँ ज्यादा त्यौहार नहीं मनाये जाते.

म्यांमार यात्रा का अंतिम दिन था,  घर से निकले एक हफ्ते से ज्यादा हो गया था . अब घर जाने की इच्छा बलवती होने लगी थी आज की व्यापारिक गतिविधियाँ  जल्दी समाप्त करके मुझे उस स्थल को देखने जाना था जहाँ हमारे इतिहास के पन्नो की एक अजीम शख्सियत और अंतिम मुग़ल ने अपना निर्वासित जीवन जीया और अंतिम साँस ली थी. आज मिस नेय की जगह मिस थंडार ने ले लिया था और इनका आंग्ल भाषा ज्ञान मुझे आश्वस्त करता था कि मै इनसे अपनी बात ठीक से कह पाउँगा.
पेशे से केमिकल इंजीनियर मिस थंडार को अंतिम  मुग़ल के बारे में नहीं पता था. रास्ते में एक रेस्त्रां में  कुछ खाने के लिए रुके. मिस थंडार ने अपने लिए सामिष भोजन आर्डर किया, मैंने बहुत सोच समझकर,  शाकाहारी नूडल्स आर्डर किया लेकिन वो मेरी समझ और एक्सपेक्टेसन से ज्यादा पानीदार निकला और और कांटे चम्मच से खाने में असुविधाजनक. पेट भर जाने का बहाना बनाते हुए मैं उसे उसके हाल पर छोड़ कर उठ लिया और उस स्थल को देखने निकल पड़े. १० मिनट की ड्राइव के बाद एक मस्जिद नुमा ईमारत के सामने कार रुकी तो सामने खड़े मौलवी साहब ने तशरीफ़ अंदर  लाने के लिए कहा. उर्दू सुनकर थोड़ी देर के लिए अपने देश में होने जैसा लगा या यूँ कहें की मरुदेश में शाद्वल जैसा लगा. बहरहाल मै मौलवी साहब के पीछे हो लिया. एक हाल नुमा कमरे में प्रवेश करते ही मल्लिकाएँ हिंदुस्तान जीनत महल की कब्र, उनके दो बेटो की कब्र से घिरी हुई. हाल की दीवारे इस बदनसीब बादशाह की अंतिम दिनों की कहानी सुना रही थी.



एक सम्राट को अंतिम दिनों में देश से निर्वासित होकर दफन होने के लिए दो गज जमीं न मिलने की विवशता का आलेख पढ़कर शायद कोई पत्थरदिल भी भाव हीन न रह पाये. हाल से उतरती सीढियाँ मुझे अंतिम मुग़ल की कब्र तक ले गई.   

और अजीज शायर सम्राट को मैंने पुष्पांजलि भेंट की. इतिहास को यहाँ जीते देखा मैंने. शाम हो गई थी, वापस लौट चला मै अपने होटल की तरफ, कल सुबह अपने वतन को लौटना था... 


      

11 comments:

  1. जबरदस्त .... बहुत शुक्रिया इल्तजा मानने का. जैसा कि आपने खुद कहा कि म्यान्मार एक क्लोज्ड देश है.इसलिए ज़फर और उस रंगून वाले गाने के अतिरिक्त सच में उसके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी. आपने काफी कुछ बता दिया.
    २-३ दिन की ही बात थी ...तो वाटर फेस्टिवल भी देख आना था न :P

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  2. बहुत अच्छा यात्रा संस्मरण, साझा करने के लिए आभार| चित्र से बोध गया का आभास हो रहा है...बहुत जानकारियाँ मिलीं |

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  4. इस यात्रा में विस्मय के पल जो आप ने स्वयं को दिए है उन्होंने हमारे दिल को भी छुआ हैI यत्रा में पल पल आनंद देने वाले घुम्मकड़ को बधाई I

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  5. हमें तो आज पता चला कि अब गानों में मेरे पिया रंगून की बजाय यंगून जाया करेंगे - - - - सच कहा आपने महसूस की जाने वाली हर बात को शब्दों में बता पाना बहुत मुश्किल है - - - मंदिर बहुत सुन्दर है और भव्य भी - - - यात्रा संस्मरण बहुत अच्छा है - - - पर एक आख़िरी बात तो रह ही गयी - - - वहाँ से क्या लाये ?? :)

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  6. ढ़िया यात्रा वृत्तांत, रोचक और जानकारीपरक है

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  7. रंगून हुआ यंगून!
    बौद्ध धर्म को मानते हुए छद्म सैनिक शासन! थोडा अजीब है न!
    रोचक संस्मरण!!

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  8. आपकी मेहरबानी से हमने भी घूम लिया रंगून। शुक्रिया।
    ............
    लज़ीज़ खाना: जी ललचाए, रहा न जाए!!

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  9. आपने तो बिन गए ही बर्मा घुमा दिया। शुक्रिया ।

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  10. रोचक यात्रा वृत्तांत .... कविताओं के इतर भी इतना अच्छा लिखते हो ...बढ़िया सैर करायी .

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  11. कितना विरोधाभास होता है कहने और करने में ,वाणी से सहमत, आपका वर्णन अच्छा लगा ,मंदिर बहुत ही सुंदर दिख रहा है । आभार इस रोचक यात्रा वर्णन के लिए

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